कलकत्ता ..

Authors Note: This is the hindi translation of Bengali poem I posted before. And this is again for you Lata. 🙂

 

बचपन  को लपेट कर पोटली में

चला  था  में  Bilaspur से ..

महल  बाप  का  पीछे  चोर  कर ..

ढेर  सारे  सपने  आँखों  में  लिए ..

कितने  शहरों  की  ख़ाक  छानी  अपनी  एक पहचान   बनाना  के  लिए ..

बहुत  anxiously इंतज़ार  के  बाद  मिली वो खबर ..

इतनी  ख़ुशी  और  कितना   घमंड ..

के  मिली  ही  गयी  आखिर  एक  नौकरी  उस  शेहर ..

जहाँ  के  हर  गली  में  है  बजता  रबिन्द्रगीत .. हर  पहर

 

क़स्बा  का वो 4 by 4 का  घर ..

खिड़कियाँ  जहाँ  की   खुलती नहीं ..

और  वो  पुराना  सा  घिसा हुआ   दरवाज़ा  ठीक  से  बंद नहीं  होता ..

Balcony में  जाने  से  डर लगता  है ..

कहीं  गिर  ना जाए  मेरे  भार  से ..

घर  की हालत  तो  कलकत्ता  के  खस्ता कचौड़ी जैसी ..

लाल  पीले  दिवार से  रोज़  गिरता प्लास्टर ..

और  नंगा  कर  देता  घर को ..

सफ़ेद  शर्ट  गर  गलती  से  दीवार  पे  लग  जाय  तो ..

झट  से  पता  चल  जाय  के  रंग  लगी  है  दीवारों  पर कैसी कैसी ..

फिर भी कितना  घमंड  है ..

कलकत्ता  जैसे  शेहर में  मेरा भी एक  घर  है …

 

अद्खुली  खिड़की  से  कभी  ठीक  से  धुप  नहीं आती ..

फिर  भी  मन खुशियों  से  भर  जाता

जब  खपरे  के  छत में  एक  छोटी  सी  छेद  से

पतली  सी  धुप  की किरण

आ  कर  गिरती  मेरे  Pink Floyd के  पोस्टर  पर ..

ऐसा लगता Pink Floyd ko उनकी खोयी  हुई  limelight फिर से मिल  गयी

फिर भी  कितना  घमंड  है ..

कलकत्ता  जैसे  शेहर  में  मेरे  भी  एक  घर  है ..

 

घर  से  निकल  कर  रास्ते  तक  जाने  के लिए ..

एक  छोटा  सा  passage है .. वहां से चार लोगों  के  ऊपर से कुद कर   जाना  पड़ता  है

एक  सुखा  सा  मारा  हुआ नाला  भी  cross करना  पड़ता  है ..

फिर  आती  है  मेरे  घर की  वो  छोटी  सी गली

एक  car गर  वहां  से  गुज़रे तो . .

आने  जाने  वालों  को  दीवार से चिपक  जाना  पड़ता है ..

मु  उठा  के  चल  देती  है  वो  कार , हजारों  लोगों  की  सुन  के गाली ..

फिर भी  कितना  घमंड  है ..

कलकत्ता  जैसे  शेहर में  मेरे भी एक  घर है ..

 

कितने दूर निकल  आया हुं …

अपना  वो  small town पीछे  छोड़  कर ..

उड़ने  की  गर  चाह  दिल  में  हो ..

तो  अपने  roots को  पकड़  के  नई  बैठा  जाता ..

Bilaspur में  गलियां  नई  है  कहीं ..

बड़ी बड़ी खुली हुयी सड़कें हैं हर जगह..

सर  उठा  कर  देखो  तो  दिखेगा .. बड़ा  सा  नीला आसमान

Bright Sunny mornings.. और  साफ़  सुथरा  जहाँ ..

कलकते  के  बात  और  है ..

आसमान  गर  देखना  हो  तो  किसी  ऊँची  ईमारत  की  छत  पे  जाना  पड़ता  है

छोटी  छोटी  गलियों  से आप  देखना  भी  चाहें ..

तो   थोड़ी  सी  किसी  एक  जगह  से  नीला  नीला  सा  दीखता  है खूब ..

बड़ी  बड़ी  इमारतें  आसमान  को  ढक कर ..

मानो  चुरा  ले  जाती  हैं  हमारी  सुन्हेरी  सी  वो धुप

फिर भी  कितना  घमंड  है

कलकत्ता  जैसे  शेहर में  मेरा भी  एक  घर  है ..

 

यहाँ  का  इंसान  भी  कुछ  अजीब  सा है ..

हताश , खोया  सा ,  व्याकुल , परेशान , confused और  कुछ  थका  सा ..

सुख  की सारी चीज़ों के बीच  हैं  फिर  भी  खुश  नहीं..

सब  का  जैसे  कुछ  चोरी  हो  गया हो ..

बाच्चों  का  बचपन , मम्मी  की  शान्ति  और  पापा  का time..

Time को  क्या  पकड़  के  रखा  जा  सका  है  कभी ?

फिर  भी   कैसे  ना  जाने  मेरे  उस  small town में  सब  time से  हो  जाता  था ..

बाचों  को  School और  tutions के  बाद  खेलने  का time…

मुम्मियों  को  सारे घर के  काम   के  बाद   घंटो  पड़ोसियों  से गप्पें लड़ाने का time..

और  पापाओं   को  दफ्तर  के  बाद  शाम  को  club में  दोस्तों  के  साथ  एक  drink पीने का  time..

कैसे  मिल  जाता  था ?

 

इंसान  जितना  पात  है  उससे  कहीं  ज़यादा  पाना  चाहता  है

सब  गर  मिल  भी  जाए  फिर  भी  ‘और’ की  चाह  न  जाए ..

फिर  भी  है  कितना  घमंड

की   में  ऐसा  एक  इंसान  हुं ..

_____________

Shoumik De

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